उपचुनाव: BJP के हाथ से क्यों निकला कैराना ? ये है हार की 5 वजह
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा संगठन की चेतावनियों के बावजूद ब्यूरोक्रेसी पर लगाम न लगा पाना भी उपचुनावों में पार्टी की हार की वजह बनी। कार्यकर्ता ही नहीं सांसद-विधायक, यहां तक कि मंत्री भी अपने जिलों के प्रशासनिक अफसरों की मनमानी पर लगातार शिकायत करते रहे। इसके बावजूद स्थिति सुधारी नहीं। उल्टे उन्हें झिड़की खानी पड़ी।
कैराना में बकाया गन्ना मूल्य को लेकर किसान नाराज थे
कैराना लोकसभा उपचुनाव में हार के पीछे गन्ना किसानों का 800 करोड़ रुपये का बकाया भी एक प्रमुख कारण रहा है। शामली प्रशासन पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसने बकाया गन्ना मूल्य के बारे में बताया ही नहीं। जाट समुदाय के जो किसान लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रबल समर्थक थे वे इस मुद्दे पर नाराज हो गये।
कैराना लोकसभा उपचुनाव में हार के पीछे गन्ना किसानों का 800 करोड़ रुपये का बकाया भी एक प्रमुख कारण रहा है। शामली प्रशासन पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसने बकाया गन्ना मूल्य के बारे में बताया ही नहीं। जाट समुदाय के जो किसान लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रबल समर्थक थे वे इस मुद्दे पर नाराज हो गये।
गांवों में नही गये चुनाव में लगे मंत्री और पदाधिकारी
ऊपर से कैराना और नूरपुर के चुनाव में लगे मंत्री और पदाधिकारी वहां भाषण देने में मशगूल रहे, गांवों में गये ही नहीं। इसलिए किसानों के इस गुस्से को भांप नहीं पाए। कैराना में राष्ट्रीय लोकदल के महासचिव जयंत चौधरी ने अपनी पार्टी की जीत पर कहा भी कि कैराना में जिन्ना हार गया, गन्ना जीत गया।
ऊपर से कैराना और नूरपुर के चुनाव में लगे मंत्री और पदाधिकारी वहां भाषण देने में मशगूल रहे, गांवों में गये ही नहीं। इसलिए किसानों के इस गुस्से को भांप नहीं पाए। कैराना में राष्ट्रीय लोकदल के महासचिव जयंत चौधरी ने अपनी पार्टी की जीत पर कहा भी कि कैराना में जिन्ना हार गया, गन्ना जीत गया।
जनप्रतिनिधियों की नहीं सुनते अफसर
बेलगाम अफसरशाही को लेकर जनप्रतिनिधि लगातार संगठन से लेकर सरकार के मंत्रियों तक अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे। बुंदेलखण्ड के जालौन के डीएम की निरंकुशता की एक विधायक सालभर से शिकायत कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के साथ किस तरह सुलूक किया जाए, इस पर मुख्य सचिव के तमाम निर्देशों का डीएम पर कोई असर नहीं दिखा। विधायक द्वारा ऊपर शिकायत करने की जानकारी मिलने पर डीएम ने उन्हें जिला विकास योजनाओं की बैठक में बुलाना बंद कर दिया।
बेलगाम अफसरशाही को लेकर जनप्रतिनिधि लगातार संगठन से लेकर सरकार के मंत्रियों तक अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे। बुंदेलखण्ड के जालौन के डीएम की निरंकुशता की एक विधायक सालभर से शिकायत कर रहे हैं। जनप्रतिनिधियों के साथ किस तरह सुलूक किया जाए, इस पर मुख्य सचिव के तमाम निर्देशों का डीएम पर कोई असर नहीं दिखा। विधायक द्वारा ऊपर शिकायत करने की जानकारी मिलने पर डीएम ने उन्हें जिला विकास योजनाओं की बैठक में बुलाना बंद कर दिया।
विधायक की बात भी नहीं सुनी गई
इसी तरह हमीरपुर के एक विधायक ने वहां के सीडीओ पर प्रधानमंत्री आवास योजना में मकान देने के नाम पर हर आवेदनकर्ता से पांच हजार रुपये वसूलने का आरोप लगाया। उसकी भी शिकायत अनसुनी कर दी गई।
इसी तरह हमीरपुर के एक विधायक ने वहां के सीडीओ पर प्रधानमंत्री आवास योजना में मकान देने के नाम पर हर आवेदनकर्ता से पांच हजार रुपये वसूलने का आरोप लगाया। उसकी भी शिकायत अनसुनी कर दी गई।
केन्द्रीय नेतृत्व को भेजी रिपोर्ट में गिनाए हार के कारण
उधर, उपचुनावों में भाजपा सरकार की चूकों पर एक गुप्त रिपोर्ट केन्द्र से लेकर प्रदेश नेतृत्व को भेजी गई है। केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर प्रदेश नेतृत्व द्वारा मंगाई गई इस आंतरिक रिपोर्ट में हार के प्रमुख कारण गिनाये गए हैं। इनमें जनप्रतनिधियों से लेकर कार्यकर्ताओं की जिला स्तर के अफसरों का न सुनना, गांव में अवारा पशु, थाना-तहसील तथा ब्लॉक स्तर भ्रष्टाचार कम न होना, निजी स्कूलों की फीस पर लचर अध्यादेश से स्कूलों पर नियंत्रण न हो पाना, चयन आयोगों के गठन के बाद भी युवा बेरोजगारों को नौकरी न मिल पाना, शिक्षा मित्र व आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों जैसे मुद्दों को निपटने में सरकार की असफलता, सपा सरकार के भ्रष्टाचारों की जांच ठीक से न हो पाना, सरकारी वकीलों की नियुक्ति एवं आयोगों में कार्यकर्ताओं की जगह रिटायर अधिकारियों को बैठाना, निगम और बोर्डों के खाली पदों पर कार्यकर्ताओं का समायोजन न होना तथा खनन पर रोक लग जाने के कारण बालू-मौरंग का महंगा होना शामिल है।
उधर, उपचुनावों में भाजपा सरकार की चूकों पर एक गुप्त रिपोर्ट केन्द्र से लेकर प्रदेश नेतृत्व को भेजी गई है। केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर प्रदेश नेतृत्व द्वारा मंगाई गई इस आंतरिक रिपोर्ट में हार के प्रमुख कारण गिनाये गए हैं। इनमें जनप्रतनिधियों से लेकर कार्यकर्ताओं की जिला स्तर के अफसरों का न सुनना, गांव में अवारा पशु, थाना-तहसील तथा ब्लॉक स्तर भ्रष्टाचार कम न होना, निजी स्कूलों की फीस पर लचर अध्यादेश से स्कूलों पर नियंत्रण न हो पाना, चयन आयोगों के गठन के बाद भी युवा बेरोजगारों को नौकरी न मिल पाना, शिक्षा मित्र व आंगनबाड़ी कार्यकर्त्रियों जैसे मुद्दों को निपटने में सरकार की असफलता, सपा सरकार के भ्रष्टाचारों की जांच ठीक से न हो पाना, सरकारी वकीलों की नियुक्ति एवं आयोगों में कार्यकर्ताओं की जगह रिटायर अधिकारियों को बैठाना, निगम और बोर्डों के खाली पदों पर कार्यकर्ताओं का समायोजन न होना तथा खनन पर रोक लग जाने के कारण बालू-मौरंग का महंगा होना शामिल है।
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