मुझे डर लगता है, कैसे समझाउंगा अपनी बेटियों को रेप शब्द का मतलब
मैंने पहली बार 'बलात्कार' शब्द 1980 में आई हिंदी फिल्म 'इनसाफ का तराजू' में सुना था। इस फिल्म में दिखाया गया बलात्कार पीडि़ताओं का दर्द और घुटन, बलात्कारी की हत्या और हमारे समाज का खोखलापन बहुत अच्छे से याद है। महिलाओं के बीच परवरिश के कारण फिल्म में बलात्कारी रमेश, जिसका किरदार राजबब्बर ने निभाया था, उसकी हत्या से काफी सुकून मिला था।
मेरी उम्र उस समय 14 साल की थी। मगर आज अखबारों के पहले पेज पर छोटी बच्चियों के साथ यौन हिंसा की खबरें पढ़ अंदर तक कांप जाता हूं। मुझे डर लगता है कि मेरी बेटियां जब मुझसे बलात्कार या रेप शब्द के मायने पूछेंगी तो मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा। एक 4 साल और एक 11 माह की बेटियों का पिता होने के नाते मुझे घुटन भी होती है और सुकून भी होता है। आजकल डे स्कूलों में बेहद छोटी बच्चियों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में बताया जाता है। सच बताऊं तो मैंने और मेरी पत्नी ने अभी तक अपनी बेटियों से इस बारे में बात नहीं की है। इसके पीछे हमारी झिझक अहम कारण है। मेरी 4 साल की बेटी आजीन की दुनिया रंग-बिरंगी मछलियों, पेड़ पर लटकी चॉकलेट और उसकी बार्बी डॉल की पिंक ड्रेसिंग टेबल के इर्द-गिर्द घूमती है।
भरोसे का कत्ल है चाइल्ड रेप
जब मैं स्कूल में था, तो रक्षाबंधन के दिन मुझे अपनी कलाई पर बंधी ढेर सारी राखियां देखकर बहुत अच्छा लगता था। मगर आज के समय में कौन एक अजनबी के साथ इस तरह का रिश्ता गंवारा करेगा। मेरे अंदर का एक हिस्सा खुद को अपराधी मानता है। मैं कैसे एक ऐसी दुनिया से उसका तार्रुफ कराऊं, जहां वो अपने पड़ोसियों, अंकल, पुरुष शिक्षकों और उसे रोजाना लाने-ले जाने वाले ड्राइवर से डरे। चाइल्ड रेप सिर्फ शारीरिक शोषण नहीं है, यह भरोसे का भी कत्ल है। यह सब सोचकर मेरा दिल कांप जाता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो पिछले 10 साल में चाइल्ड रेप के मामलों में 336 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2016में जहां बलात्कार के 19765 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2015 में यह आंकड़ा 10,854 का था।
बाल यौन शोषण करने वालों के लिए हो बलात्कारी से भी बड़ा शब्द
निठारी, कठुआ, उन्नाव, इंदौर में जो कुछ हुआ उसे राष्ट्रीय शर्म से कम कुछ नहीं कहा जा सकता है। मैं इन बलात्कारियों को आतंकियों से कम नहीं मानता हूं। इनके लिए बलात्कारी से भी बड़ा कोई शब्द होना चाहिए। सरकार ने हाल ही में 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के बलात्कारी को मृत्युदंड देने का कानून बनाया है। जरा सोचिए अगर किसी बलात्कारी की उम्र 13 साल है, तो उसे कम सजा मिलने पर हम खुद को कैसे समझाएंगे। कहां हैं रेप क्राइसिस सेंटर और फास्ट ट्रैक कोर्ट? उन्नाव और कठुआ की घटनाओं को देखने के बाद, एक पिता के तौर पर मेरी रूह अंदर से कांप जाती है।
सिस्टम को कोसना या सरकार को बुरा-भला कहने से अच्छा है कि हम अपने भीतर भी झांकें। हमारे समाज में लड़कियों को उत्पाद के रूप में पेश करने की सोच है, सबसे पहले उसे बदलने की जरूरत है। घर से लेकर ऑफिस, फिल्म इंडस्ट्री हर जगह यह सोच हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है। बचपन में मैंने देखा है, हमारे यहां नवरात्र में कन्या पूजन की परंपरा है। अब जरा सोचिए, नवरात्र में परिवार का जो सबसे वरिष्ठ पुरुष होता है वो उनका आशीर्वाद लेता है। यही अंकल जी जब घर से बाहर निकलते हैं तो उसी उम्र की लड़कियों को देखकर यौन इशारे करते हैं। मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं, जिनकी टेनिस में दिलचस्पी महिला खिलाडि़यों की छोटी स्कर्ट के कारण है। उनकी अच्छी सर्विस के लिए वह गेम नहीं देखते हैं।
क्या जरूरत है आईपीएल में चियरगर्ल्स की
निजी तौर पर मैं मानता हूं कि इंडियन प्रीमियर लीग में चियरगर्ल्स की क्या जरूरत है। हो सकता है आप मुझे प्राचीन कालीन कहें, मगर एक खेल के मैदान में इस तरह की वेश-भूषा में लड़कियों की क्या जरूरत है। क्रिकेट के मैदान में भीड़ जुटाने के लिए कम कपड़ों में लड़कियों को खड़ा करना कतई जरूरी नहीं है। मैंने देखा है, बिजनेस क्लास में ट्रैवल करने वाले लोग किस तरह से महिला परिचारिकाओं से बदतमीजी करते हैं। कुछ को लगता है, वह उन्हें तंग कर सकते हैं, तो कुछ 'रोमियो' को लगता है कि एयर होस्टेस सबसे मुस्कुरा कर बात करती हैं, तो वह उनकी हर डिमांड के लिए उपलब्ध हैं।
स्मार्ट फोन और सस्ते इंटरनेट से बढ़ी समस्या
लोग यह कहने पर मेरी आलोचना करेंगे मगर, मेरा मानना है कि आसानी से ऑनलाइन उपलब्ध एडल्ट सामग्री इस समस्या में और इजाफा करती है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट से पॉर्न और खासतौर से चाइल्ड पॉर्नोग्राफी की पहुंच लोगों तक आसान है। एक मैग्जीन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 2012 से 2014 के बीच बाल यौन शोषण से संबंधित वेबपेज में 147 फीसदी का उछाल आया। मतलब साफ है, अगर यह सप्लाई है तो डिमांड भी जरूर होगी।

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