उप-चुनाव नतीजे: पीएम मोदी से लेकर मायावती तक, क्या है इसके मायने


वो दिन चले गए जब राजनीति में उप-चुनावों को ज्यादा अहमियत नहीं दिया जाता था। अब पार्टी ना सिर्फ पूरे जोर शोर के साथ उप-चुनाव के मैदान में उतरती है बल्कि इस पर अच्छी खासी रकम भी खर्च करती है। उसकी वजह है इसका बढ़ता राजनीतिक महत्व। चार लोकसभा सीट पर उपचुनाव, नौ विधानसभा उप-चुनाव और कर्टनाक में एक विधानसभा सीट पर चुनाव का राजनेताओं पर किस तरह असर हो सकता है, आइये जानते हैं-

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नरेन्द्र मोदी और अमित शाह
उप-चुनाव के नतीजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह दोनों के लिए राजनीतिक रूप से एक झटका है। अमित शाह लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि उप-चुनाव स्थानीय मुद्दों पर होता है। लेकिन, हकीकत ये है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक लगातार तीसरा चुनाव हार चुकी है। इसका मतलब ये हुआ कि विपक्षियों के एक साथ आने के चलते राज्य में 2014 का प्रदर्शन दोहराना बीजेपी के लिए काफी चुनौतीपूर्ण भरा होगा।
   
राहुल गांधी
बीजेपी की हार से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को नई ऊर्जा मिल सकती है। हालांकि, ये अभी देखनेवाली बात होगी कि अगर गैर बीजेपी ताकत एक साथ आती है तो क्या भगवा ताकत को रोका जा सकता है। कांग्रेस की यही रणनीति है जिस पर उसने आगे बढ़ने का फैसला किया है। लेकिन, राहुल गांधी की सबसे बड़ी चिंता ये है कि पार्टी अपनी सहयोगियों पर निर्भर है और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उसकी मौजूदगी ना के बराबर है।

जयंत चौधरी
चार साल के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खासा पैठ रखने वाली अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल ने दोबारा वापसी की है। पार्टी में अजित सिंह से जयंत चौधरी तक एक पीढ़ी का साफतौर पर बदलाव है, जो अपनी बदौलत नेता के रूप में उभरे हैं। उनके चुनाव प्रचार ने जाट वोट बैंक में मदद की है। साथ ही, जाट-मुस्लिम राजनीतिक समीकरण की भी वापसी हुई है। लेकिन, सबसे बड़ी चुनौती उनके लिए राजनीतिक सफलता और अगले चुनाव में सामाजिक संतुलन बनाए रखना है।

तेजस्वी यादव
जिस वक्त आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव जेल में थे, उनके बेटे तेजस्वी ने राष्ट्रीय जनता दल को सम्मानजनक सफलता दिलाई है। अररिया उप-चुनाव में के बाद जोकीहाट विधानसभा चुनाव में आरजेडी की जीत ने तेजस्वी यादव के हौसले को और बढ़ा दिया है। इसके साथ ही, 2019 के चुनाव में नीतीश-बीजेपी गठबंधन के लिए राज्य में मुश्किलें भी बढ़ाकर रख दी है। इसके अलावा इस जीत ने आरजेडी को विपक्षी एकता का एक प्रमुख सहयोगी बना दिया है। 

अखिलेश यादव और मायावती
कैराना में हुए लोकसभा उपचुनाव में एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी ने सीधे राष्ट्रीय लोकदल का समर्थन किया तो वहीं बहुजन समाज पार्टी परोक्ष तौर पर आरएलडी उम्मीदवार का समर्थन किया। मायावती-अखिलेश के आपसी समझौते के चलते उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराने में मदद मिली है। इन जीतों से दोनों के बीच आपसी गठंधन के लिए उनकी प्रतिबद्धता और मजबूत होगी और 2019 के चुनाव में दोनों नेता बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकते हैं।

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